बिस्मिल्लाह इर रहमान इर रहीम
जुम्मा खुतुबा
हज़रत
मुहयिउद्दीन अल-खलीफतुल्लाह
मुनीर
अहमद अज़ीम (अ त ब अ)
01 December 2017
(12 Rabi'ul Awwal 1439 AH)
दुनिया
भर के सभी नए शिष्यों
(और सभी मुसलमानों) सहित अपने सभी शिष्यों को शांति के अभिवादन के साथ बधाई
देने के बाद हज़रत खलीफतुल्लाह (अ
त ब अ) ने तशह्हुद, तौज़, सूरह
अल फातिहा पढ़ा, और फिर उन्होंने अपना उपदेश दिया: एक पिता के रूप में
इस्लाम के पवित्र पैगंबर ('यौम-उन-नबी': एक
पिता के रूप में पैगम्बर)
आज शुक्रवार 12 रबीउल अव्वल 1439 AH है। मुस्लिम जगत का अधिकांश हिस्सा यौम-उन-नबी- पैगंबर(स अ
व स) का
दिन मनाता है, जबकि अन्य इसे मिलाद-उन-नबी- पैगंबर (स अ
व स) का
जन्मदिन कहते हैं। यद्यपि जन्मदिन मनाना पवित्र पैगंबर मुहम्मद (स अ व स) की सुन्नत नहीं थी, फिर भी प्रत्येक मुसलमान को यह ध्यान में रखना चाहिए कि
गैर-मुसलमानों की प्रथाओं (जैसे केक काटना और मोमबत्ती जलाना और इच्छाएं मांगना, नृत्य, संगीत
और शराब आदि के साथ पार्टी करना) से
मिलते जुलते उत्सव इस्लाम में सख्त वर्जित हैं।
जहां तक हमारा
सवाल है, हम सीरत-उन-नबी, यानी पैगंबर
(स अ व स) की जीवन कहानी को याद करना
पसंद करते हैं ताकि हम एक इंसान और पैगंबर के रूप में उनके आदर्श चरित्र को याद रख
सकें। मुहम्मद का शाब्दिक अर्थ है बहुत प्रशंसित। पैगम्बर होने का दावा करने से
पहले ही, उनके अपने लोग उन्हें सच्चा और भरोसेमंद मानते थे। इस्लाम के पवित्र
पैगम्बर
(स अ व स) तीन बेटों और चार बेटियों के पिता थे। हज़रत ख़दीजा से दो
बेटे पैदा हुए, कासिम और अब्दुल्लाह, जिन्हें परिवार में तय्यब और ताहिर नाम दिया
गया। बाद में उनकी
कॉप्टिक (मिस्र) पत्नी (Coptic wife) {Note} हजरत मारिया (जो
बाद में मुस्लिम बन गयीं)
से एक और पुत्र, इब्राहीम का जन्म हुआ। सबसे पहले जन्मे कासिम थे जिनके नाम पर, अरब रीति-रिवाज के
अनुसार, पवित्र पैगंबर खुद को अबुल कासिम,
यानी कासिम के पिता कहलाते थे। इस्लाम के आगमन से पहले दो वर्ष की
आयु में कासिम की मृत्यु हो गयी। कासिम
के बगल में उनकी सबसे बड़ी बेटी ज़ैनब थी। उनके बाद बेटियाँ रुकय्या, उम्मे कुलसूम थीं और
सभी बेटियों में सबसे छोटी फातिमा थी। पवित्र
पैगंबर और हज़रत ख़दीजा की सबसे छोटी संतान अब्दुल्ला थे, जिनका
निधन इस्लाम के आगमन से पहले एक शिशु के रूप में हो गया था। हज़रत ख़दीजा को अपने
पिछले पतियों से दो बच्चे थे, एक से बेटा और दूसरे से बेटी, और दोनों
को हिंद कहा जाता था। जाहिर है, बच्चे अपने पिता के संबंधित
परिवारों के साथ ही रहे और समय-समय पर स्नेह और उपहार प्राप्त करने के लिए उनसे मिलने
आते रहे। ऐसा लगता है कि बेटा, हिंद इब्न अबी हला पैगंबर, अपने
सौतेले पिता से बहुत जुड़ा हुआ था क्योंकि बाद में इस्लाम में, उन्होंने
पवित्र पैगंबर (स अ व स) के बारे में उत्साहपूर्वक मार्मिक शब्दों में लिखा: "... उनका मुंह मोतियों से भरे माणिकों के बक्से की
तरह था,
उनका
चेहरा पूर्ण चंद्रमा से भी अधिक सुंदर था ..." यह असंदिग्ध अंतरंगता और असाधारण प्रेम और सम्मान को दर्शाता है।
अरब
परम्परा के अनुसार, जब जैद बिन हारिस को बिक्री के लिए पेश किया गया तो
पवित्र पैगम्बर (स अ
व स) ने हजरत खदीजा से उसे खरीदने के लिए कहा। अतः जैद बिन हारिस को खरीद लिया
गया और उसे मुक्त कर दिया गया। पवित्र पैगंबर (स अ व स) और हज़रत ख़दीजा ने उन्हें अपने बेटे के रूप में गोद
ले लिया और बाद में उन्हें ज़ैद बिन मुहम्मद के नाम से जाना गया। वह पवित्र
पैगम्बर के संरक्षण में रहे और एक उल्लेखनीय वफादार साथी और आस्तिक बन गए।
सबसे
बड़ी बेटी हज़रत ज़ैनब का विवाह अबुल-आस बिन रबी बिन अब्द शम्स से हुआ था। हज़रत रुकय्या और हज़रत उम्मे कुलसूम का विवाह पवित्र पैगंबर के चाचा अबू लहब के बेटों उत्बा और उतैबा से हुआ था। जैसे-जैसे समय बीतता गया और उन्होंने स्वयं को इस्लाम का
पैगम्बर घोषित कर दिया, जैसे-जैसे समय
बीतता गया और उन्होंने स्वयं को इस्लाम का पैगम्बर घोषित किया, अबू लहब
ने अपने बेटों पर दबाव डाला कि वे उनकी
(सल्ललाहु अलैहि व सल्लम की) बेटियों
रुकय्या और उम्मे कुलसूम को तलाक दे दें और बाद में पहली विवाहिता के निधन के बाद, दोनों
बहनों का विवाह एक के बाद एक हजरत उस्मान बिन अफ्फान से कर
दिया गया। दोनों
बेटियों की मृत्यु पवित्र पैगम्बर के जीवनकाल में ही हो गयी थी। सबसे छोटी पुत्री
हज़रत फातिमा का विवाह हज़रत अली से हुआ था और वह पैगम्बर मुहम्मद से जीवित बची
एकमात्र संतान थीं। अपने पिता की मृत्यु से वह बहुत दुखी हुई और परिणामस्वरूप घटना
के छह महीने के भीतर ही उनकी मृत्यु हो गई।
सर्वशक्तिमान
अल्लाह ने इस्लाम के पवित्र पैगंबर (स अ व स) और कॉप्टिक {Note}मूल की उनकी पत्नी हज़रत मारिया को एक बेटे का
आशीर्वाद दिया, जिसका नाम इब्राहिम रखा गया। यह पवित्र पैगम्बर (स अ व स) के लिए एक
उल्लासमय अवसर था। यह स्वाभाविक था कि उन्होंने नवजात शिशु के प्रति अपना स्नेह
व्यक्त किया। बच्चे की मां हज़रत मारिया भी पैगम्बर मुहम्मद (स अ व स) के लिए
खुशियां लेकर आईं। उन्होंने अबू रफी की पत्नी दाई (midwife) सलमा को भी
उदारतापूर्वक पुरस्कृत किया। उन्होंने जन्म का जश्न बहुत खुशी के साथ मनाया
क्योंकि उनका उससे गहरा लगाव था क्योंकि उन्होंने अपने दो बेटों अल कासिम और
अब्दुल्ला को कम उम्र में ही खो दिया था।
उनकी बेटियों ने वयस्क (grew to maturity) होने के बाद विवाह किया और बच्चे पैदा
किये, लेकिन उनकी संतानों
में से केवल फातिमा ही जीवित बची। स्वाभाविक रूप से इन सभी पुत्रों और पुत्रियों
की मृत्यु से, जो एक के बाद एक चल बसे और जिन्हें पवित्र पैगम्बर ने स्वयं अपने
हाथों से दफना दिया, उन्हें भारी शोक हुआ। इसलिए, यह स्वाभाविक था कि एक पिता जो इतना शोकग्रस्त
था, इब्राहिम के जन्म पर
बेहद खुश और ख़ुशी महसूस कर रहा था।
अफ़सोस, इब्राहीम
ने पवित्र पैगम्बर (स अ व स) को जो प्रसन्नता प्रदान की, वह अधिक
समय तक नहीं रही। शीघ्र ही बच्चा गंभीर रूप से बीमार पड़ गया। उन्हें मशाबत उम्म-ए-इब्राहिम
के पास खजूर के बाग में ले जाया गया, जहाँ उनकी माँ और उनकी माँ की बहन सिरिन ने उनकी
देखभाल की। जब उनकी हालत खराब हो गई और यह स्पष्ट हो गया कि वे अधिक समय तक जीवित
नहीं रहेंगे, तो पवित्र पैगम्बर (स अ व स) को सूचित
किया गया और उन्हें बुलाया गया। इस समाचार से वे इतना स्तब्ध रह गये कि उन्हें लगा
कि उनके घुटने अब उन्हें सहारा नहीं दे पाएंगे और उन्होंने अब्दुर रहमान इब्न औफ
से अपना हाथ सहारा देने के लिए कहा।
पवित्र पैगम्बर (स अ व स) तुरन्त अपनी पत्नी मरिया
के घर पहुंचे और ठीक समय पर उस शिशु को विदाई देने के लिए पहुंचे जो उनकी मां की
गोद में मर रहा था। इस नई त्रासदी (tragedy) से उनका दिल टूट गया था
और उनके चेहरे पर उनकी आंतरिक पीड़ा झलक रही थी। दुख से घुटते हुए उन्होंने अपने
बेटे से कहा:
“ऐ इब्राहीम, ईश्वर के फैसले के खिलाफ हम तुम्हारी कोई मदद
नहीं कर सकते” और फिर वे चुप हो गये।
उनकी आँखों से आँसू बहने लगे। बच्चा धीरे-धीरे बेहोश हो गया और उसकी माँ और मौसी ज़ोर-ज़ोर से
रोने लगीं, लेकिन पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उन्हें
कभी रुकने के लिए नहीं कहा। जब इब्राहीम की मृत्यु निकट आ रही थी, तो
पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने आँखों
में आँसू भरकर बच्चे से बात की: "ऐ इब्राहीम, यदि यह सत्य निश्चित न
होता कि हममें से अंतिम व्यक्ति पहले वाले से मिल जाएगा, तो हम तुम्हारे लिए
उससे भी अधिक शोक मनाते जितना कि अब कर रहे हैं।" एक क्षण बाद उन्होंने कहा: "आँखें आँसू बहाती हैं
और दिल दुखी होता है, लेकिन हम कुछ नहीं कहते सिवाय उसके जो हमारे अल्लाह को पसंद हो।
वास्तव में,
हे
इब्राहीम,
हम आपके
हमसे दूर जाने से दुखी हैं।"
पवित्र
पैगम्बर मुहम्मद (सल्लल्लाहु अलैहि वसल्लम) ने उनके
दुख को दबाने और हल्का करने की कोशिश की। हज़रत मरिया और उनकी बहन सिरीन की ओर
देखकर उन्होंने उनसे प्रसन्नतापूर्वक कहा कि जन्नत में इब्राहीम की अपनी नर्स
होगी।
उम्म-ए-बुर्दा, या एक अन्य संस्करण के अनुसार, अल-फ़ज़ल इब्न
अब्बास ने दफ़न की तैयारी में बच्चे के शरीर को धोया। उन्हें पवित्र पैगंबर (स अ व स) और कई
मुसलमानों द्वारा एक छोटे से बिस्तर पर अल-बकी के कब्रिस्तान में ले जाया गया, जहां
पवित्र पैगंबर (स अ व स) द्वारा पढ़ी गई प्रार्थना के बाद उन्हें आराम दिया
गया। पवित्र पैगम्बर (स अ व स) ने कब्र को ढकने का आदेश दिया। उन्होंने उसमें रेत भर
दी, थोड़ा पानी छिड़का और एक समाधि-पत्थर खड़ा कर दिया।
फिर उन्होंने कहा: "कब्र के पत्थर न तो
अच्छा करते हैं और न ही बुरा, लेकिन वे जीवित लोगों को खुश करने में मदद करते हैं। मनुष्य जो कुछ
भी करता है,
भगवान
उसके लिए अच्छा
चाहता है।"
यह दर्ज
है कि पवित्र पैगंबर (स अ
व स) ने कहा: "अगर इब्राहीम जीवित
होते, तो वह एक सच्चे पैगंबर
होते।"
(कंज़ुल उम्माल)। इब्राहीम की
मृत्यु सूर्य ग्रहण के समय हुई थी, जिसे मुसलमानों ने चमत्कार के रूप में देखा। वे यह
कहते फिरते थे कि इब्राहीम की मृत्यु के दुःख में सूर्य ग्रहणग्रस्त हो गया।
पवित्र पैगंबर (स अ व स) ने उन्हें सुना और कहा:
"सूर्य
और चंद्रमा भगवान के संकेत हैं। वे किसी भी व्यक्ति की मृत्यु या जन्म के लिए
ग्रहण नहीं हैं। इसलिए, ग्रहण देखते समय भगवान को याद करो और उससे प्रार्थना करो।”
अल्लाह
हमारे आदर्श और आदर्श रहने वाले पैगम्बर हज़रत मुहम्मद (सल्लल्लाहू
अलैहि वसल्लम) और उनके परिवार के सदस्यों और साथियों से सदैव प्रसन्न
और प्रेम रखे। और वह अपनी उम्मत
पर दया और प्रेम की दृष्टि बनाए रखे और
हमें अपने प्यारे मालिक (सल्लल्लाहू अलैहि वसल्लम) के
पदचिन्हों पर चलकर इस्लाम की महिमा को वापस लाने में मदद करे। आमीन।
अनुवादक : फातिमा जैस्मिन सलीम
जमात उल सहिह अल इस्लाम - तमिलनाडु
Note : कॉप्टिक शब्द ग्रीक शब्द 'Αἰγύπτιος' से बना है जिसका मतलब
'मिस्र' होता है. कॉप्टिक शब्द का मतलब मिस्र के लोग भी होता है. अरबों
के मिस्र पर कब्ज़े के बाद, कॉप्ट शब्द उन मिस्रवासियों के लिए इस्तेमाल होने लगा
जो ईसाई धर्म को मानते थे.